Chhath Puja 2020: कब दिया जाएगा सूर्य को अंतिम अर्घ्य? जानें इसके नियम और लाभ

कार्तिक मास में भगवान सूर्य की पूजा की परंपरा है. शुक्ल पक्ष में षष्ठी तिथि को छठ पूजा (Chhath Puja 2020) विधान है. इस पूजा की शुरुआत मुख्य रूप से बिहार और झारखण्ड से हुई है जो अब देश-विदेश तक फैल चुकी है. षष्ठी तिथि का संबंध संतान की आयु से होता है. इसलिए सूर्य देव और षष्ठी की पूजा से संतान प्राप्ति और और उसकी आयु रक्षा दोनों हो जाती है.


छठ का पहला अर्घ्य कब दिया जाता है? छठ का पहला अर्घ्य षष्ठी तिथि को दिया जाता है. इस बार पहला अर्घ्य 20 नवंबर को दिया जाएगा. यह अर्घ्य अस्ताचलगामी सूर्य को दिया जाता है. इस समय जल में दूध डालकर सूर्य की अंतिम किरण को अर्घ्य दिया जाता है. माना जाता है कि सूर्य की एक पत्नी का नाम प्रत्यूषा है. अस्ताचल सूर्य को अर्घ्य देने के नियम क्या हैं? अर्घ्य देने के लिए जल में जरा सा दूध मिलाया जाता है , बहुत सारा दूध व्यर्थ न करें. टोकरी में फल और ठेकुवा आदि सजाकर सूर्य देव की उपासना करें. उपासना और अर्घ्य के बाद आपकी जो भी मनोकामना है, उसे पूरी करने की प्रार्थना करें. प्रयास करें कि सूर्य को जब अर्घ्य दे रहे हों तो सूर्य का रंग लाल हो. पहला अर्घ्य देने के लाभ क्या हैं? संध्या समय अर्घ्य देने से कुछ विशेष तरह के लाभ होते हैं. इससे नेत्र ज्योति बढ़ती है. लंबी आयु मिलती है और आर्थिक सम्पन्नता आती है. इस समय का अर्घ्य विद्यार्थी भी दे सकते हैं. इससे उनको शिक्षा में भी लाभ होगा. जिनको चिकित्सा या मेडिकल में लाभ पाना है. उनके लिए सायंकालीन अर्घ्य वरदान है.

छठ का अंतिम दिन पहला अर्घ्य षष्ठी तिथि को शाम को दिया जाता है. अंतिम अर्घ्य सप्तमी तिथि को उगते हुए सूर्य को अरुण वेला में देते हैं. इस बार अंतिम अर्घ्य 21 नवंबर को दिया जाएगा. इस अर्घ्य को देने के बाद ही व्रती व्रत का समापन करते हैं. व्रत का समापन कच्चा दूध और प्रसाद ग्रहण करके होता है. छठ के अंतिम अर्घ्य के लाभ क्या हैं? इससे संतान सम्बन्धी समस्याएं दूर होती हैं. इससे नाम यश बढ़ता है. अपयश के योग भंग होते हैं. पिता पुत्र के सम्बन्ध ठीक होते हैं. हृदय रोग तथा हड्डियों के रोग में अद्भुत लाभ होता है.

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